ALL ABOUT REPO-RATE AND ITS SIGNIFICANCE

What is Repo-Rate ( रेपो-रेट क्या है ) ?
Repo Rate is the rate (Say Interest-Rate) at which the RBI (Reserve Bank of India) lends money to commercial banks (Like SBI, ICICI, HDFC, etc.) in the event of any shortfall of funds against securities such as treasury bills or government bonds.
Repo rate is used by monetary authorities to control inflation.
रेपो-रेट वह दर है ( ऐसा कहिये की ब्याज-दर है ) जिस पर RBI ( भारतीय रिजर्व बैंक ) वाणिज्यिक बैंकों ( जैसे SBI, ICICI, HDFC, आदि ) को धन की कमी की स्थिति में धन उधार देता है, ट्रेजरी बिल या सरकारी बॉन्ड जैसी प्रतिभूतियों के बदले में।
महंगाई/मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक प्राधिकारियों द्वारा रेपो दर का उपयोग किया जाता है।
How does Repo-rate controls inflation ( रेपो-रेट महंगाई को कैसे नियंत्रित करता है ) ?
To understand this, first of all, we need to know – How inflation increases !
There are many reasons which result in increase of inflation but one main reason is “Consumer spending”.
More jobs and higher wages increases household incomes and lead to rise in comsumer spending.
Now, Aggregate Demand increases while production is same or relatively lower which offers scope to producers/manufacturers to increase the prices of their goods or services.
And now, inflation increases with the rising prices of goods and services.
Now, in the event of inflation, RBI increases repo rate as it acts as a disincentive for banks to borrow from the RBI and then commercial banks also increase their lending rates (Like Interest rates of Home Loan, Term Loan, Cash Credit, etc.) to consumers. This ultimately reduces the money supply in the market/economy and thus helps in arresting inflation.
On the other hand, when the RBI needs to pump in funds into the economy, it lowers the repo-rate.
इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि महंगाई कैसे बढ़ती है !
ऐसे कई कारण हैं जिनके परिणामस्वरूप महंगाई/मुद्रास्फीति में वृद्धि होती है लेकिन एक मुख्य कारण “उपभोक्ता-खर्च” है।
अधिक नौकरियां और उच्च-मजदूरी दर से घरेलू आय में वृद्धि होती है और उपभोक्ता-खर्च में वृद्धि होती है।
अब कुल मांग (Demand) बढ़ जाती है जबकि उत्पादन समान या अपेक्षाकृत कम होता है जो उत्पादकों/निर्माताओं को उनके सामान या सेवाओं की कीमतों में वृद्धि करने की गुंजाइश प्रदान करता है।
और अब, वस्तुओं और सेवाओं की बढ़ती कीमतों के साथ महंगाई/मुद्रास्फीति बढ़ती है।
अब, महंगाई/मुद्रास्फीति की स्थिति में, आरबीआई रेपो-दर में वृद्धि करता है क्योंकि यह बैंकों को आरबीआई से उधार लेने के लिए एक निरुत्साहक के रूप में कार्य करता है और फिर वाणिज्यिक बैंक भी अपनी उधार-दरों में वृद्धि करते हैं (जैसे होम लोन, टर्म लोन, कैश क्रेडिट आदि की ब्याज दरें) उपभोक्ताओं के लिए। यह अंततः बाजार/अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति को कम करता है और इस प्रकार महंगाई/मुद्रास्फीति को रोकने में मदद करता है।
दूसरी ओर, जब आरबीआई को अर्थव्यवस्था में धन पंप करने की आवश्यकता होती है, तो वह रेपो-दर को कम कर देता है।

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